श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 52: तापसी स्वयंप्रभा के पूछने पर वानरों का उसे अपना वृत्तान्त बताना और उसके प्रभाव से गुफा के बाहर निकलकर समुद्रतट पर पहुँचना  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  4.52.16-17h 
त्वां चैवोपगता: सर्वे परिद्यूना बुभुक्षिता:।
आतिथ्यधर्मदत्तानि मूलानि च फलानि च॥ १६॥
अस्माभिरुपयुक्तानि बुभुक्षापरिपीडितै:।
 
 
अनुवाद
दुर्बल और भूख से व्याकुल होकर हम सब आपकी शरण में आए। आपने आतिथ्य के नियमानुसार हमें फल और मूल दिए और हमने भी भूखे रहकर उन्हें तृप्त होकर खाया॥16 1/2॥
 
Being weak and troubled by hunger, we all took refuge in you. As per the rules of hospitality, you offered us fruits and roots and we too, being hungry, ate them to our fill.॥ 16 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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