श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 52: तापसी स्वयंप्रभा के पूछने पर वानरों का उसे अपना वृत्तान्त बताना और उसके प्रभाव से गुफा के बाहर निकलकर समुद्रतट पर पहुँचना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  4.52.12 
अस्माद्धंसा जलक्लिन्ना: पक्षै: सलिलरेणुभि:।
कुररा: सारसाश्चैव निष्पतन्ति पतत्त्रिण:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
थोड़ी देर में हंस, सारस आदि पक्षी गुफा से निकले, उनके पंख जल से भीगे हुए थे और उन पर कीचड़ लगा हुआ था॥12॥
 
‘In a short while, swans, cranes and other birds emerged from the cave, their feathers were wet with water and had mud on them.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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