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श्लोक 4.5.31  |
सीताकपीन्द्रक्षणदाचराणां
राजीवहेमज्वलनोपमानि।
सुग्रीवरामप्रणयप्रसङ्गे
वामानि नेत्राणि समं स्फुरन्ति॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| सुग्रीव और राम की इस प्रेममयी मैत्री के प्रसंग में सीता का खिले हुए कमल के समान बायाँ नेत्र, वानरराज बालि का सुवर्ण के समान बायाँ नेत्र तथा प्रज्वलित अग्नि के समान रात्रिचर प्राणियों का बायाँ नेत्र एक साथ फड़कने लगे ॥31॥ |
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| In the context of this loving friendship between Sugreeva and Rama, Sita's left eye, like a blooming lotus, the left eye of the monkey king Vali, like gold and the left eye of the night creatures, like the blazing fire, started fluttering simultaneously. ॥ 31॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चम: सर्ग: ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ॥ |
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