श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 5: श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री तथा श्रीराम द्वारा वालि वध की प्रतिज्ञा  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.5.30 
तव प्रसादेन नृसिंह वीर
प्रियां च राज्यं च समाप्नुयामहम्।
तथा कुरु त्वं नरदेव वैरिणं
यथा न हिंस्यात् स पुनर्ममाग्रजम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
हे वीर! नरसिंह! ऐसा प्रयत्न करो कि तुम्हारी कृपा से मैं अपनी प्रिय पत्नी और राज्य पुनः प्राप्त कर सकूँ। हे नरदेव! मेरा बड़ा भाई मेरा शत्रु बन गया है। उसकी ऐसी दशा कर दो कि वह मुझे फिर न मार सके।॥30॥
 
‘Valiant! Man-lion! Make such efforts that I may get my beloved wife and kingdom back with your grace. O Lord of men! My elder brother has become my enemy. Please make him in such a condition that he cannot kill me again.'॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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