श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 5: श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री तथा श्रीराम द्वारा वालि वध की प्रतिज्ञा  »  श्लोक 13-14h
 
 
श्लोक  4.5.13-14h 
ततो हनूमान् संत्यज्य भिक्षुरूपमरिंदम:॥ १३॥
काष्ठयो: स्वेन रूपेण जनयामास पावकम्।
 
 
अनुवाद
(सुग्रीव के पास जाने से पूर्व हनुमान ने पुनः साधु का रूप धारण कर लिया था।) श्री राम और सुग्रीव की मैत्री के समय शत्रुदमन हनुमान ने साधु का रूप त्यागकर अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया था और दो लकड़ियों को रगड़कर अग्नि उत्पन्न की थी।
 
(Before going to Sugreeva, Hanuman once again assumed the form of a monk.) At the time of friendship between Shri Ram and Sugreeva, Shatrudaman Hanuman abandoned the form of a monk and assumed his natural form and created fire by rubbing two sticks. 13 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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