श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 49: अङ्गद और गन्धमादन के आश्वासन देने पर वानरों का पुनः उत्साह पूर्वक अन्वेषण-कार्य में प्रवृत्त होना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.49.6 
अनिर्वेदं च दाक्ष्यं च मनसश्चापराजयम्।
कार्यसिद्धिकराण्याहुस्तस्मादेतद् ब्रवीम्यहम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
उत्साह, बल और साहस न हारना - ये कार्यसिद्धि में सहायक माने गए हैं; इसीलिए मैं यह सब तुमसे कह रहा हूँ॥6॥
 
Enthusiasm, strength and never losing courage - these are considered to be the virtues that help one accomplish a task; that is why I am telling you all this.॥ 6॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd