| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड » सर्ग 49: अङ्गद और गन्धमादन के आश्वासन देने पर वानरों का पुनः उत्साह पूर्वक अन्वेषण-कार्य में प्रवृत्त होना » श्लोक 2-3 |
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| | | | श्लोक 4.49.2-3  | वनानि गिरयो नद्यो दुर्गाणि गहनानि च।
दरी गिरिगुहाश्चैव विचिता: सर्वमन्तत:॥ २॥
तत्र तत्र सहास्माभिर्जानकी न च दृश्यते।
तथा रक्षोऽपहर्ता च सीतायाश्चैव दुष्कृती॥ ३॥ | | | | | | अनुवाद | | हमने वनों, पर्वतों, नदियों, दुर्गम स्थानों, घने जंगलों, गुफाओं और कंदराओं में प्रवेश करके भली-भाँति देखा; परन्तु हमें उनमें से किसी भी स्थान पर माता जानकीजी का दर्शन नहीं हुआ और न ही वह पापी राक्षस ही मिला जिसने उनका हरण किया था॥ 2-3॥ | | | | We entered into forests, mountains, rivers, inaccessible places, dense jungles, caves and caverns and looked thoroughly; but we did not see Janaki in any of those places, nor did we find the sinful demon who had abducted her.॥ 2-3॥ | | ✨ ai-generated | | |
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