श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 48: दक्षिण दिशा में गये हुए वानरों का सीता की खोज आरम्भ करना  »  श्लोक 2-4
 
 
श्लोक  4.48.2-4 
स तु दूरमुपागम्य सर्वैस्तै: कपिसत्तमै:।
ततो विचित्य विन्ध्यस्य गुहाश्च गहनानि च॥ २॥
पर्वताग्रनदीदुर्गान् सरांसि विपुलद्रुमान्।
वृक्षषण्डांश्च विविधान् पर्वतान् वनपादपान्॥ ३॥
अन्वेषमाणास्ते सर्वे वानरा: सर्वतो दिशम्।
न सीतां ददृशुर्वीरा मैथिलीं जनकात्मजाम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
वे उन समस्त श्रेष्ठ वानरों के साथ बहुत दूर तक चलकर विन्ध्याचल में आये और वहाँ की गुफाओं, वनों, पर्वत शिखरों, नदियों, दुर्गम स्थानों, सरोवरों, बड़े-बड़े वृक्षों, झाड़ियों तथा नाना प्रकार के पर्वतों और जंगली वृक्षों में सर्वत्र खोज की; किन्तु उन समस्त वीर वानरों को मिथिला की कन्या जनकनन्दिनी सीता कहीं भी दिखाई नहीं दीं॥ 2-4॥
 
After traversing a very long distance with all those excellent monkeys, He went to Vindhyachal and searched everywhere in the caves, jungles, mountain peaks, rivers, inaccessible places, lakes, big trees, bushes and various kinds of mountains and wild trees; but all those valiant monkeys did not see Mithila's daughter Janakanandini Sita anywhere.॥ 2-4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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