श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 47: पूर्व आदि तीन दिशाओं में गये हुए वानरों का निराश होकर लौट आना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.47.5 
सर्वर्तुकांश्च देशेषु वानरा: सफलद्रुमान्।
आसाद्य रजनीं शय्यां चक्रु: सर्वेष्वह:सु ते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
दिनभर भिन्न-भिन्न देशों में घूमकर वे वानर उन वृक्षों पर जाते थे जो सभी ऋतुओं में फल देते थे और रात्रि में वहीं सोते या विश्राम करते थे ॥5॥
 
After roaming around in different countries the whole day those monkeys used to go to trees that bore fruits in all seasons and used to sleep or rest there at night. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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