श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 46: सुग्रीव का श्रीरामचन्द्रजी को अपने भूमण्डल-भ्रमण का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.46.7 
अथाहं गतबुद्धिस्तु सुव्यक्तं निहतो गुरु:।
शिला पर्वतसंकाशा बिलद्वारि मया कृता॥ ७॥
 
 
अनुवाद
‘तब मेरे मन में आया कि अब तो मेरा बड़ा भाई अवश्य ही मर गया है।’ यह विचार मन में आते ही मैंने उस गुफा के द्वार पर एक पर्वत-जैसी चट्टान रख दी।
 
‘Then it came to my mind that now my elder brother is definitely dead. As soon as this thought came to my mind, I placed a mountain-like rock at the entrance of that cave.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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