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श्लोक 4.46.5  |
ततोऽहं तत्र निक्षिप्तो गुहाद्वारि विनीतवत्।
न च निष्क्रामते वाली तदा संवत्सरे गते॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| 'उस समय मैं उस गुफा के द्वार पर विनम्रतापूर्वक खड़ा रहा; क्योंकि वालि मुझे वहीं छोड़ गया था। किन्तु एक वर्ष बीत जाने पर भी वालि उस गुफा के अन्दर से बाहर नहीं आया।' |
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| ‘At that time I stood humbly at the entrance of that cave; because Vali had left me there. But even after a year had passed, Vali did not come out from inside it. 5. |
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