श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 46: सुग्रीव का श्रीरामचन्द्रजी को अपने भूमण्डल-भ्रमण का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 20-21h
 
 
श्लोक  4.46.20-21h 
हिमवन्तं च मेरुं च समुद्रं च तथोत्तरम्।
यदा न विन्दे शरणं वालिना समभिद्रुत:॥ २०॥
ततो मां बुद्धिसम्पन्नो हनुमान् वाक्यमब्रवीत्।
 
 
अनुवाद
हिमालय, मेरु और उत्तरी सागर तक पहुँचने पर भी जब बालि के पीछा करने के कारण मुझे कहीं भी आश्रय नहीं मिला, तब परम बुद्धिमान हनुमान्‌जी ने मुझसे यह कहा -॥20 1/2॥
 
Even after reaching the Himalayas, Meru and the Northern Ocean, when I was not able to find shelter anywhere due to Vali's pursuit, then the most intelligent Hanuman Ji said this to me -॥ 20 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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