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श्लोक 4.46.19  |
स पश्यन् विविधान् देशानस्तं च गिरिसत्तमम्।
प्राप्य चास्तं गिरिश्रेष्ठमुत्तरं सम्प्रधावित:॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| वहाँ नाना प्रकार के देशों को देखता हुआ मैं पर्वत की सबसे ऊँची चोटी, पश्चिम दिशा में पहुँचा। वहाँ पहुँचकर मैं पुनः उत्तर दिशा की ओर दौड़ा॥19॥ |
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| Seeing various countries there I reached the highest point of the mountain, the west. After reaching there I again ran towards the north.॥ 19॥ |
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