श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 46: सुग्रीव का श्रीरामचन्द्रजी को अपने भूमण्डल-भ्रमण का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.46.19 
स पश्यन् विविधान् देशानस्तं च गिरिसत्तमम्।
प्राप्य चास्तं गिरिश्रेष्ठमुत्तरं सम्प्रधावित:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
वहाँ नाना प्रकार के देशों को देखता हुआ मैं पर्वत की सबसे ऊँची चोटी, पश्चिम दिशा में पहुँचा। वहाँ पहुँचकर मैं पुनः उत्तर दिशा की ओर दौड़ा॥19॥
 
Seeing various countries there I reached the highest point of the mountain, the west. After reaching there I again ran towards the north.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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