श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 46: सुग्रीव का श्रीरामचन्द्रजी को अपने भूमण्डल-भ्रमण का वृत्तान्त बताना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.46.17 
दिशस्तस्यास्ततो भूय: प्रस्थितो दक्षिणां दिशम्।
विन्ध्यपादपसंकीर्णां चन्दनद्रुमशोभिताम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उस दिशा को छोड़कर मैं पुनः दक्षिण दिशा की ओर चला, जो विन्ध्य पर्वतों और नाना प्रकार के वृक्षों से युक्त है तथा चन्दन के वृक्षों से सुशोभित है॥17॥
 
Leaving that direction I again headed towards the south, which is full of the Vindhya mountains and various kinds of trees and is adorned by sandalwood trees.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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