श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 45: विभिन्न दिशाओं में जाते हुए वानरों का सुग्रीव के समक्ष अपने उत्साहसूचक वचन सुनाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.45.17 
इत्येकैकस्तदा तत्र वानरा बलदर्पिता:।
ऊचुश्च वचनं तस्य हरिराजस्य संनिधौ॥ १७॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अपने बल के गर्व से भरे हुए वानर एक-एक करके वानरराज सुग्रीव के पास आते और उनसे उपरोक्त बातें कहते ॥17॥
 
In this manner, the monkeys, full of pride of their power, would come one by one to Sugreeva, the king of monkeys, and say the above mentioned things to him. ॥17॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे पञ्चचत्वारिंश: सर्ग: ॥ ४ ५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ५॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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