श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 44: श्रीराम का हनुमान जी को अँगूठी देकर भेजना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  4.44.8 
तत: कार्यसमासङ्गमवगम्य हनूमति।
विदित्वा हनुमन्तं च चिन्तयामास राघव:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
सुग्रीव की बात सुनकर श्री रामचंद्रजी को यह अनुभव हुआ कि इस कार्य को सम्पन्न करने का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व हनुमान पर ही है। उन्हें स्वयं भी ऐसा अनुभव हुआ कि हनुमान ही इस कार्य को सफल बनाने में समर्थ हैं। तब वे मन में इस प्रकार विचार करने लगे-॥8॥
 
After listening to Sugreeva, Shri Ramchandraji realized that the entire responsibility of accomplishing this task rests on Hanuman. He himself also felt that Hanuman is capable of making this task successful. Then he started thinking in his mind like this -॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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