श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 44: श्रीराम का हनुमान जी को अँगूठी देकर भेजना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.44.5 
गतिर्वेगश्च तेजश्च लाघवं च महाकपे।
पितुस्ते सदृशं वीर मारुतस्य महौजस:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे वीर! हे महारथी! सर्वत्र अबाधित गति, वेग, तेज और चपलता - ये सब गुण आपके पिता वायु के समान ही आपमें विद्यमान हैं॥5॥
 
Valiant! O great warrior! Unhindered speed, velocity, sharpness and agility everywhere - you possess all these virtues just like your mighty father Vayu.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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