श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 42: सुग्रीव का पश्चिम दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए सुषेण आदि वानरों को वहाँ भेजना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.42.25 
तत्र वैदूर्यवर्णाभो वज्रसंस्थानसंस्थित:।
नानाद्रुमलताकीर्णो वज्रो नाम महागिरि:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
पारियात्र पर्वत के निकट समुद्र में वज्र नामक एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत है, जो नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से आच्छादित प्रतीत होता है। वह वज्रगिरि वैदूर्यमणि के समान नीले रंग का है। कठोरता में वह वज्रमणि (हीरे) के समान है।॥ 25॥
 
‘Near the Pariyatra mountain, in the sea, there is a very high mountain known as Vajra, which appears to be covered with various types of trees and creepers. That Vajragiri is blue in colour like the Vaidurya Mani. It is like the Vajra Mani (diamond) in hardness.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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