श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 41: सुग्रीव का दक्षिण दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए वहाँ प्रमुख वानर वीरों को भेजना  »  श्लोक 44-45h
 
 
श्लोक  4.41.44-45h 
तत: परं न व: सेव्य: पितृलोक: सुदारुण:॥ ४४॥
राजधानी यमस्यैषा कष्टेन तमसाऽऽवृता।
 
 
अनुवाद
‘उसके आगे अत्यन्त भयानक पितृलोक है; तुम लोगों को वहाँ नहीं जाना चाहिए। यह भूमि यमराज की राजधानी है, जो दुःखदायी अंधकार से आच्छादित है।
 
‘Beyond that is the most terrifying Pitrloka; you people should not go there. This land is the capital of Yamaraja, which is covered with painful darkness.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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