श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 41: सुग्रीव का दक्षिण दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए वहाँ प्रमुख वानर वीरों को भेजना  »  श्लोक 40-41
 
 
श्लोक  4.41.40-41 
सर्वरत्नमय: श्रीमानृषभो नाम पर्वत:।
गोशीर्षकं पद्मकं च हरिश्यामं च चन्दनम्॥ ४०॥
दिव्यमुत्पद्यते यत्र तच्चैवाग्निसमप्रभम्।
न तु तच्चन्दनं दृष्ट्वा स्प्रष्टव्यं तु कदाचन॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
वह सुन्दर ऋषभ पर्वत रत्नों से परिपूर्ण है। वहाँ गोशीर्ष, पद्मक, हरिश्याम आदि नामों से दिव्य चंदन उगता है। वह चंदन का वृक्ष अग्नि के समान जलता रहता है। उसे देखकर तुम्हें कभी भी उस चंदन को छूना नहीं चाहिए।
 
That beautiful Rishabh mountain is full of gems. Divine sandalwood with names like Goshirshaka, Padmaka, Harishyaam etc. grows there. That sandalwood tree keeps burning like fire. You should never touch that sandalwood after seeing it.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd