श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 41: सुग्रीव का दक्षिण दिशा के स्थानों का परिचय देते हुए वहाँ प्रमुख वानर वीरों को भेजना  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  4.41.36-37 
तत्र भोगवती नाम सर्पाणामालय: पुरी॥ ३६॥
विशालरथ्या दुर्धर्षा सर्वत: परिरक्षिता।
रक्षिता पन्नगैर्घोरैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैर्महाविषै:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
उसी पर्वत पर नागों से निवास करने वाली एक नगरी है, जिसका नाम भोगवती है (यह पाताल की भोगवती पुरी से भिन्न है)। यह नगरी अजेय है। इसके मार्ग बहुत बड़े और चौड़े हैं। यह सब ओर से सुरक्षित है। तीखे दाँतों वाले और अत्यंत विषैले भयानक नाग इसकी रक्षा करते हैं॥ 36-37॥
 
‘On the same mountain there is a city inhabited by serpents, whose name is Bhogavati (this is different from Bhogavati Puri of the netherworld). This city is invincible. Its roads are very large and wide. It is safe from all sides. Terrible serpents with sharp fangs and extremely poisonous ones protect it.॥ 36-37॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd