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श्लोक 4.39.5  |
त्वत्सनाथ: सखे संख्ये जेतास्मि सकलानरीन्।
त्वमेव मे सुहृन्मित्रं साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| हे मित्र! तुम्हारी सहायता और सुरक्षा से मैं युद्ध में समस्त शत्रुओं को परास्त कर दूँगा। तुम मेरे हितैषी मित्र हो और तुम ही मेरी सहायता कर सकते हो॥5॥ |
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| Friend! With your help and protection I will defeat all the enemies in the war. You are my well wishing friend and you are the only one who can help me.॥ 5॥ |
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