| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड » सर्ग 39: श्रीरामचन्द्रजी का सुग्रीव के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना तथा विभिन्न वानरयूथपतियों का अपनी सेनाओं के साथ » श्लोक 38-39 |
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| | | | श्लोक 4.39.38-39  | शरभ: कुमुदो वह्निर्वानरो रंह एव च।
एते चान्ये च बहवो वानरा: कामरूपिण:॥ ३८॥
आवृत्य पृथिवीं सर्वां पर्वतांश्च वनानि च।
यूथपा: समनुप्राप्ता येषां संख्या न विद्यते॥ ३९॥ | | | | | | अनुवाद | | इनके अतिरिक्त शरभ, कुमुद, वह्नि और रण - ये तथा अन्य अनेक वानर राजा इच्छानुसार रूप धारण करके सम्पूर्ण पृथ्वी, पर्वत और वनों को आच्छादित करते हुए वहाँ प्रकट हुए, जिनकी गणना नहीं की जा सकती। | | | | Besides these, Sharabha, Kumud, Vahni and Ranh - these and many other monkey-kings, taking forms as per their wish, appeared there covering the whole earth, mountains and forests, and they cannot be counted. | | ✨ ai-generated | | |
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