श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 36: सुग्रीव का अपनी लघुता तथा श्रीराम की महत्ता बताते हए लक्ष्मण से क्षमा माँगना और लक्ष्मण का उनकी प्रशंसा करके उन्हें अपने साथ चलने के लिये कहना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.36.5 
प्रणष्टा श्रीश्च कीर्तिश्च कपिराज्यं च शाश्वतम्।
रामप्रसादात् सौमित्रे पुनश्चाप्तमिदं मया॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'सुमित्रपुत्र! मेरा धन, यश और चिरस्थायी वानरों का राज्य - ये सब नष्ट हो गए थे। भगवान् श्री राम की कृपा से ही मुझे ये सब पुनः प्राप्त हुए हैं॥ 5॥
 
‘Sumitra's son! My wealth, fame and the everlasting kingdom of the monkeys - all these had been destroyed. It is only by the grace of Lord Shri Ram that I have regained all these.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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