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श्लोक 4.36.5  |
प्रणष्टा श्रीश्च कीर्तिश्च कपिराज्यं च शाश्वतम्।
रामप्रसादात् सौमित्रे पुनश्चाप्तमिदं मया॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| 'सुमित्रपुत्र! मेरा धन, यश और चिरस्थायी वानरों का राज्य - ये सब नष्ट हो गए थे। भगवान् श्री राम की कृपा से ही मुझे ये सब पुनः प्राप्त हुए हैं॥ 5॥ |
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| ‘Sumitra's son! My wealth, fame and the everlasting kingdom of the monkeys - all these had been destroyed. It is only by the grace of Lord Shri Ram that I have regained all these.॥ 5॥ |
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