श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 36: सुग्रीव का अपनी लघुता तथा श्रीराम की महत्ता बताते हए लक्ष्मण से क्षमा माँगना और लक्ष्मण का उनकी प्रशंसा करके उन्हें अपने साथ चलने के लिये कहना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.36.17 
दोषज्ञ: सति सामर्थ्ये कोऽन्यो भाषितुमर्हति।
वर्जयित्वा मम ज्येष्ठं त्वां च वानरसत्तम॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे महावानरराज! आपके और मेरे बड़े भाई के अतिरिक्त और कौन ऐसा विद्वान् पुरुष है जो सामर्थ्य होते हुए भी ऐसी विनम्र वाणी कह सकता है?॥17॥
 
O great monkey king! Besides you and my elder brother, who else is such a learned man who despite having the capability can say such humble words?॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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