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श्लोक 4.36.11  |
यदि किंचिदतिक्रान्तं विश्वासात् प्रणयेन वा।
प्रेष्यस्य क्षमितव्यं मे न कश्चिन्नापराध्यति॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| यदि श्रद्धा या प्रेम के कारण कोई पाप हो जाए, तो मेरे सेवक का वह पाप क्षमा कर दिया जाए; क्योंकि ऐसा कोई सेवक नहीं है, जो कभी पाप न करता हो॥11॥ |
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| If any sin is committed due to faith or love, then that sin of my servant should be forgiven; because there is no such servant who never commits any sin.'॥ 11॥ |
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