श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 35: तारा का लक्ष्मण को युक्तियुक्त वचनों द्वारा शान्त करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.35.3 
नैवाकृतज्ञ: सुग्रीवो न शठो नापि दारुण:।
नैवानृतकथो वीर न जिह्मश्च कपीश्वर:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे वीर! वानरराज सुग्रीव न तो कृतघ्न हैं, न बेईमान, न क्रूर, न असत्यवादी और न ही बेईमान॥3॥
 
Valiant! King of the monkeys Sugreev is neither ungrateful, nor dishonest, nor cruel, nor untruthful, nor dishonest.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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