श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 35: तारा का लक्ष्मण को युक्तियुक्त वचनों द्वारा शान्त करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  4.35.10 
न च रोषवशं तात गन्तुमर्हसि लक्ष्मण।
निश्चयार्थमविज्ञाय सहसा प्राकृतो यथा॥ १०॥
 
 
अनुवाद
‘तात लक्ष्मण! तुम्हें सत्य को जाने बिना साधारण मनुष्य की भाँति अचानक क्रोध नहीं करना चाहिए। 10॥
 
‘Tat Lakshman! You should not be subject to sudden anger like an ordinary person without knowing the truth. 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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