श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  4.33.66 
रुमां तु वीर: परिरभ्य गाढं
वरासनस्थो वरहेमवर्ण:।
ददर्श सौमित्रिमदीनसत्त्वं
विशालनेत्र: स विशालनेत्रम्॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
सुन्दर सुवर्ण के समान कान्ति और विशाल नेत्रों वाले वीर सुग्रीव अपनी पत्नी रुमा को आलिंगन में लिए हुए उत्तम आसन पर बैठे थे। उसी अवस्था में उन्होंने उदार हृदय और विशाल नेत्रों वाले सुमित्रकुमार लक्ष्मण को देखा। 66॥
 
Brave Sugriva, who had a glow like beautiful gold and huge eyes, was sitting on a noble seat, holding his wife Ruma in a tight embrace. In the same state, he saw Sumitra Kumar Lakshman, who had a generous heart and huge eyes. 66॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये किष्किन्धाकाण्डे त्रयस्त्रिंश: सर्ग: ॥ ३ ३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ३॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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