श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  4.33.63 
तत: सुग्रीवमासीनं काञ्चने परमासने।
महार्हास्तरणोपेते ददर्शादित्यसंनिभम्॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
वहाँ जाकर उसने देखा कि एक स्वर्ण सिंहासन पर एक बहुमूल्य पलंग बिछा हुआ है और उस पर वानरराज सुग्रीव सूर्य के समान तेजस्वी रूप धारण करके बैठे हुए हैं।
 
Going there he saw that a precious bed was spread on a golden throne and the monkey king Sugreeva was sitting on it having assumed a radiant form like the Sun.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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