श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  4.33.58 
इत्येवमुक्त्वा वचनं महार्थं
सा वानरी लक्ष्मणमप्रमेयम्।
पुन: सखेदं मदविह्वलाक्षी
भर्तुर्हितं वाक्यमिदं बभाषे॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
अत्यन्त बलवान लक्ष्मण से ऐसे महान अर्थपूर्ण वचन कहकर, बेचैन नेत्रों वाली वानरपत्नी तारा ने पुनः खेदपूर्वक अपने स्वामी के लिए ये हितकर वचन कहे-॥58॥
 
Having said such words of great meaning to the immeasurably powerful Lakshmana, Tara, the monkey wife with restless eyes, again regretfully said these beneficial words for her master -॥ 58॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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