श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  4.33.57 
महर्षयो धर्मतपोऽभिरामा:
कामानुकामा: प्रतिबद्धमोहा:।
अयं प्रकृत्या चपल: कपिस्तु
कथं न सज्जेत सुखेषु राजा॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
जो लोग सदा धर्म और तप में लगे रहते हैं, जिन्होंने आसक्ति को रोक लिया है और अज्ञान को दूर भगा दिया है, वे महान् ऋषिगण भी कभी-कभी विषय-भोगों के लिए इच्छुक हो जाते हैं; फिर स्वभाव से चंचल वानर राजा सुग्रीव क्यों भोगों में आसक्त न हों?॥57॥
 
‘Those who are always engaged in religious practices and austerities, who have blocked attachment and driven away ignorance, even those great sages sometimes become desirous of sensual pleasures; then why should King Sugreeva, who is by nature a restless monkey, not be attached to pleasures?’॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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