न कामतन्त्रे तव बुद्धिरस्ति
त्वं वै यथा मन्युवशं प्रपन्न:।
न देशकालौ हि यथार्थधर्मा-
ववेक्षते कामरतिर्मनुष्य:॥ ५५॥
अनुवाद
'तुम क्रोध के वशीभूत हो गए हो, ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हें काम-ग्रस्त मनुष्य की स्थिति का भी ज्ञान नहीं है, बन्दर की तो बात ही क्या। काम-ग्रस्त मनुष्य भी देश, काल, धन और धर्म का ज्ञान खो देता है - वह उनकी ओर देखता ही नहीं॥ 55॥
‘You have fallen prey to anger, it seems that you have no knowledge of the condition of a man overcome by lust, let alone a monkey. Even a man overcome by lust loses the knowledge of place, time, wealth and religion – he does not look at them.॥ 55॥