श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  4.33.55 
न कामतन्त्रे तव बुद्धिरस्ति
त्वं वै यथा मन्युवशं प्रपन्न:।
न देशकालौ हि यथार्थधर्मा-
ववेक्षते कामरतिर्मनुष्य:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
'तुम क्रोध के वशीभूत हो गए हो, ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हें काम-ग्रस्त मनुष्य की स्थिति का भी ज्ञान नहीं है, बन्दर की तो बात ही क्या। काम-ग्रस्त मनुष्य भी देश, काल, धन और धर्म का ज्ञान खो देता है - वह उनकी ओर देखता ही नहीं॥ 55॥
 
‘You have fallen prey to anger, it seems that you have no knowledge of the condition of a man overcome by lust, let alone a monkey. Even a man overcome by lust loses the knowledge of place, time, wealth and religion – he does not look at them.॥ 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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