श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  4.33.53 
जानामि कोपं हरिवीरबन्धो-
र्जानामि कार्यस्य च कालसङ्गम्।
जानामि कार्यं त्वयि यत्कृतं न-
स्तच्चापि जानामि यदत्र कार्यम्॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
मैं वीर वानर सुग्रीव के मित्र प्रभु श्री राम के क्रोध का कारण जानता हूँ। उनके कार्य में हो रहे विलम्ब से भी मैं अनभिज्ञ नहीं हूँ। सुग्रीव के उस कार्य को भी मैं जानता हूँ जो आपके अधीन था और जिसे आपने पूरा किया है। इस समय आपके समक्ष जो कार्य प्रस्तुत है, उसके सम्बन्ध में हमारा क्या कर्तव्य है, यह भी मैं भली-भाँति जानता हूँ॥ 53॥
 
I know the reason for the anger of Lord Shri Ram, the friend of the brave monkey Sugreeva. I am also not unaware of the delay in his work. I also know about the work of Sugreeva which was under your supervision and which you have completed. I also know very well what our duty is regarding the work that is presented to you at this time.॥ 53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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