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श्लोक 4.33.52  |
कोपं कथं नाम गुणप्रकृष्ट:
कुमार कुर्यादपकृष्टसत्त्वे।
कस्त्वद्विध: कोपवशं हि गच्छेत्
सत्त्वावरुद्धस्तपस: प्रसूति:॥ ५२॥ |
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| अनुवाद |
| कुमार! श्रेष्ठ गुणों वाला पुरुष, निम्न गुणों वाले पर कैसे क्रोध कर सकता है? तुम्हारे समान जो सत्त्वगुण से बाधित है, जो शास्त्रविरुद्ध कर्म नहीं कर सकता तथा जो उत्तम विचारों को जन्म देता है, वह क्रोध से वश में हो सकता है?॥ 52॥ |
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| ‘Kumar! How can a person who is superior in virtues become angry with a being of inferior virtues? Who like you, who is obstructed by the Sattva Guna and who cannot engage in activities contrary to the scriptures and who gives birth to good thoughts, can be overcome by anger?॥ 52॥ |
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