श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  4.33.47 
धर्मलोपो महांस्तावत् कृते ह्यप्रतिकुर्वत:।
अर्थलोपश्च मित्रस्य नाशे गुणवतो महान्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
'यदि अवसर आने पर भी मित्र द्वारा किया गया उपकार न चुकाया जाए, तो धर्म की हानि होती है। यदि गुणवान मित्र से मित्रता टूट जाए, तो धन की भी बड़ी हानि उठानी पड़ती है।'
 
‘If the favour done by a friend is not repaid even when the opportunity arises, then there is loss of Dharma. If the friendship with a virtuous friend breaks, then one has to bear a great loss of money as well.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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