श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  4.33.46 
नहि धर्मार्थसिद्धॺर्थं पानमेवं प्रशस्यते।
पानादर्थश्च कामश्च धर्मश्च परिहीयते॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
‘धर्म और धन की सिद्धि के लिए प्रयत्नशील मनुष्य के लिए ऐसा मद्यपान अच्छा नहीं माना जाता; क्योंकि मद्य धन, धर्म और काम का नाश कर देता है ॥46॥
 
‘Such drinking is not considered good for a man who is striving for the accomplishment of religion and wealth; Because alcohol destroys wealth, religion and work. 46॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd