श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  4.33.44 
न चिन्तयति राज्यार्थं सोऽस्मान् शोकपरायणान्।
सामात्यपरिषत् तारे काममेवोपसेवते॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
हे तारागण! सुग्रीव तो केवल अपने राज्य की स्थिरता के लिए ही प्रयत्न कर रहे हैं। हम लोग शोक में डूबे हुए हैं, परन्तु उन्हें हमारी कोई चिंता नहीं है। वे अपने मन्त्रियों तथा राजसभा के सदस्यों सहित केवल विषय-भोगों में ही लिप्त हैं॥ 44॥
 
‘Stars! Sugreeva is making efforts only for the stability of his kingdom. We are immersed in grief, but he is not concerned about us at all. He, along with his ministers and members of the royal court, is only indulging in sensual pleasures.॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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