श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  4.33.43 
किमयं कामवृत्तस्ते लुप्तधर्मार्थसंग्रह:।
भर्ता भर्तृहिते युक्ते न चैनमवबुध्यसे॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
हे पति के हित में तत्पर तारा! तुम्हारा यह पति विषय-भोगों में लिप्त होकर धर्म और अर्थ का संग्रह खो रहा है। क्या तुम्हें उसकी स्थिति का ज्ञान नहीं है? तुम उसे समझा क्यों नहीं देती?
 
Tara, who is devoted to the welfare of her husband! This husband of yours is getting engrossed in sensual pleasures and is losing the collection of Dharma and Artha. Are you not aware of his condition? Why don't you explain it to him?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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