श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  4.33.41 
किं कोपमूलं मनुजेन्द्रपुत्र
कस्ते न संतिष्ठति वाङ्‍‍निदेशे।
क: शुष्कवृक्षं वनमापतन्तं
दावाग्निमासीदति निर्विशङ्क:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
राजकुमार! आपके क्रोध का कारण क्या है? ऐसा कौन है जो आपकी आज्ञा के अधीन नहीं है? सूखे वृक्षों से भरे और चारों ओर फैली हुई दावानल वाले वन में कौन निर्भय होकर प्रवेश कर रहा है?॥41॥
 
‘Prince! What is the reason for your anger? Who is not under your command? Who is fearlessly entering the forest full of dry trees and the forest fire spreading all around?’॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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