श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.33.31 
ततस्तारां हरिश्रेष्ठ: सुग्रीव: प्रियदर्शनाम्।
उवाच हितमव्यग्रस्त्राससम्भ्रान्तमानस:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
भय के मारे वह मन में घबरा गया। (लक्ष्मण के सामने जाने का साहस न हुआ।) तथापि किसी प्रकार धैर्य धारण करके वानरों में श्रेष्ठ सुग्रीव ने परम सुन्दरी तारा से हितकर बात कही-॥31॥
 
Due to fear, he became nervous in his mind. (He did not have the courage to go in front of Lakshman.) However, somehow gathering his patience, the best of the monkeys Sugreeva spoke something beneficial to the most beautiful Tara -॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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