श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.33.28 
तेन चापस्वनेनाथ सुग्रीव: प्लवगाधिप:।
विज्ञायागमनं त्रस्त: स चचाल वरासनात्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
धनुष की टंकार सुनकर वानरराज सुग्रीव ने समझ लिया कि लक्ष्मण यहाँ पहुँच गए हैं। तब वे भयभीत होकर अपना सिंहासन छोड़कर खड़े हो गए॥ 28॥
 
Hearing the twirling of the bow, the monkey king Sugreeva understood that Lakshmana had reached here. Then he got frightened and left his throne and stood up.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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