श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  4.33.27 
चारित्रेण महाबाहुरपकृष्ट: स लक्ष्मण:।
तस्थावेकान्तमाश्रित्य रामकोपसमन्वित:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
रघुकुल के अनुकूल आचार को ध्यान में रखते हुए बलवान लक्ष्मण थोड़ा पीछे हटकर एकान्त में खड़े हो गए। जब ​​उन्होंने देखा कि श्री रामचन्द्रजी के कार्य को सिद्ध करने के लिए कोई भी प्रयत्न नहीं कर रहा है, तो वे मन ही मन क्रोधित हो रहे थे॥ 27॥
 
Keeping in mind the moral conduct befitting the Raghu clan, the powerful Lakshmana stepped back a little and stood in solitude. He was becoming angry in his heart when he saw that no one was making any effort to accomplish the task of Shri Ramchandra.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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