श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  4.33.26 
रोषवेगप्रकुपित: श्रुत्वा चाभरणस्वनम्।
चकार ज्यास्वनं वीरो दिश: शब्देन पूरयन्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर आभूषणों की झंकार सुनकर वीर लक्ष्मण क्रोध के आवेश से और भी अधिक कुपित हो गए और उन्होंने अपने धनुष की टंकार की, जिसकी ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाएँ गूंज उठीं॥ 26॥
 
Then, hearing the tinkling of ornaments again, the brave Lakshmana became even more infuriated with the surge of anger and he twanged his bow, with the sound of which all directions resounded.॥ 26॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd