श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  4.33.20 
हैमराजतपर्यङ्कैर्बहुभिश्च वरासनै:।
महार्हास्तरणोपेतैस्तत्र तत्र समावृतम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
वहाँ चाँदी और सोने के अनेक पलंग और जगह-जगह अनेक उत्तम आसन रखे हुए थे और उन सब पर बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे। इन सबसे भीतरी कक्ष सुसज्जित प्रतीत हो रहा था।
 
There were many beds of silver and gold and many excellent seats placed here and there and precious beddings were spread on all of them. With all these the inner chamber appeared decorated.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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