श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 33: लक्ष्मण का सुग्रीव के महल में क्रोधपूर्वक धनुष को टंकारना, सुग्रीव का तारा को उन्हें शान्त करने के लिये भेजना तथा तारा का समझा-बुझाकर उन्हें अन्तःपुर में ले आना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.33.15 
शुक्लै: प्रासादशिखरै: कैलासशिखरोपमै:।
सर्वकामफलैर्वृक्षै: पुष्पितैरुपशोभितम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
कैलाश पर्वत के समान श्वेत शिखर वाले उस महल का शिखर तथा समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले फलों से युक्त दिव्य वृक्ष उस राजमहल की शोभा बढ़ा रहे थे ॥15॥
 
The white peak of the palace, similar to the peak of Kailash, and the divine trees blossoming with fruits that fulfil all desires, enhanced the beauty of that royal palace. ॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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