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श्लोक 4.32.6  |
न खल्वस्ति मम त्रासो लक्ष्मणान्नापि राघवात्।
मित्रं स्वस्थानकुपितं जनयत्येव सम्भ्रमम्॥ ६॥ |
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| अनुवाद |
| मुझे न तो लक्ष्मण का और न ही श्री रघुनाथजी का कोई भय है, परन्तु फिर भी जो मित्र मेरे बिना किसी दोष के क्रोधित हो जाता है, उससे हृदय में चिन्ता उत्पन्न होती है। |
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| Of course I have no fear of Lakshmana or Sri Raghunathji, but even then a friend who gets angry without any fault of mine creates anxiety in the heart. |
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