श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 32: हनुमान जी का चिन्तित हुए सुग्रीव को समझाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.32.3 
न मे दुर्व्याहृतं किंचिन्नापि मे दुरनुष्ठितम्।
लक्ष्मणो राघवभ्राता क्रुद्ध: किमिति चिन्तये॥ ३॥
 
 
अनुवाद
‘मैंने न तो कोई अनुचित वचन कहे हैं और न ही कोई बुरा काम किया है। फिर श्री रघुनाथजी के भाई लक्ष्मण मुझ पर क्यों क्रोधित हैं? मैं बार-बार इसी बात पर विचार करता रहता हूँ॥3॥
 
‘I have neither spoken any inappropriate words nor have I done any bad deed. Then why is Lakshmana, the brother of Shri Raghunath, angry with me? I keep thinking about this again and again.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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