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श्लोक  4.30.47 
विपक्वशालिप्रसवानि भुक्त्वा
प्रहर्षिता सारसचारुपङ्‍‍क्तिः ।
नभ: समाक्रामति शीघ्रवेगा
वातावधूता ग्रथितेव माला॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
पके हुए धान के डंठलों को खाकर प्रसन्नता से भरी हुई और तीव्र गति से चलती हुई सारसों की वह सुन्दर पंक्ति, वायु से झंकृत पुष्पमाला के समान आकाश में उड़ रही है।
 
That beautiful line of cranes, full of joy and moving at a great speed after eating the ripe paddy stalks, are flying in the sky like a garland of flowers vibrated by the wind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)