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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 4: किष्किंधा काण्ड  »  सर्ग 30: शरद्-ऋतु का वर्णन तथा श्रीराम का लक्ष्मण को सुग्रीव के पास जाने का आदेश देना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  4.30.45 
चञ्चच्चन्द्रकरस्पर्शहर्षोन्मीलिततारका।
अहो रागवती संध्या जहाति स्वयमम्बरम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
यह कितने आश्चर्य की बात है कि प्रेममय संध्या (या प्रेम से परिपूर्ण नायिका) जिसके तारे सुन्दर चन्द्रमा की किरणों के स्पर्श से प्रसन्नता से किंचित चमक रहे हैं (या प्रियतम के हाथों के स्पर्श से प्रसन्नता से जिसके नेत्र किंचित चमक गए हैं) वह स्वयं आकाश (आकाश या वस्त्र) को त्याग रही है!*॥ 45॥
 
How astonishing it is that the love-filled evening (or the heroine filled with love) whose stars are slightly shining due to the joy of being touched by the rays of the beautiful Moon (or whose eyes have slightly brightened due to the joy of being touched by the beloved's hands) is herself abandoning the sky (the sky or the cloth)!*॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)